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बाबा रामदेव जी का जीवन परिचय — जन्म, परिवार, परचे और समाधि

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बाबा रामदेव जी ने भादवा सुदी एकादशी, विक्रम संवत 1442 को रुणिचा (आज का रामदेवरा, जिला जैसलमेर) में जीवित समाधि ली। लोक-परंपरा के अनुसार उनका जन्म वि.सं. 1409 में तंवर राजपूत राजा अजमल जी और रानी मैणादे के घर हुआ, और लगभग 33 वर्ष की आयु में उन्होंने समाधि ली। उनकी जयंती भादवा सुदी बीज को मनाई जाती है।

पिताअजमल जी तंवर
मातामैणादे
पत्नीनेतलदे
समाधिवि.सं. 1442, भादवा सुदी 11

संक्षिप्त परिचय

बाबा रामदेव जी राजस्थान के लोक-देवता हैं, जिन्हें हिंदू “रामदेव जी” और “रुणिचा रा धणी” कहकर, और मुस्लिम श्रद्धालु “रामसा पीर” कहकर पूजते हैं। उन्हें भगवान श्रीकृष्ण (द्वारकाधीश) का अवतार माना जाता है। वे ऊँच-नीच और छुआछूत के विरोधी थे, और उन्होंने गरीबों, दलितों व पीड़ितों को अपनाया। इसी कारण उनके भक्त हर जाति और धर्म में हैं।

जन्म और अवतार की कथा

लोक-कथा के अनुसार राजा अजमल जी संतानहीन थे और द्वारका जाकर द्वारकाधीश की भक्ति की। प्रभु ने वचन दिया कि वे स्वयं उनके घर पुत्र रूप में आएँगे। इसके बाद अजमल जी के घर पहले वीरमदेव जी और फिर रामदेव जी का जन्म हुआ।

जन्म की तिथि और स्थान पर अलग-अलग मत हैं। अधिकतर स्रोत वि.सं. 1409 मानते हैं। जयंती की परंपरा भादवा सुदी बीज की है, जबकि कुछ स्रोत चैत्र सुदी पंचमी लिखते हैं। जन्मस्थान के रूप में कुछ परंपराएँ बाड़मेर ज़िले के उंडू-काश्मीर गाँव को मानती हैं, तो कुछ रुणिचा को। विस्तार से: अजमल जी का परचा · माता मैणादे का दूध परचा।

परिवार

  • पिता: राजा अजमल जी तंवर
  • माता: रानी मैणादे
  • बड़े भाई: वीरमदेव जी
  • बहनें: सुगना बाई (कथा) और लाछा बाई; धर्म बहन डाली बाई (डाली बाई मंदिर)
  • पत्नी: नेतलदे (नेतलदे परचा)

प्रमुख परचे (चमत्कार)

बाबा के 24 परचे प्रसिद्ध हैं। इनमें से कुछ जाने-माने हैं: बचपन में कपड़े के घोड़े को उड़ाना (कपड़े का घोड़ा), भैरव राक्षस का अंत (भैरव राक्षस), मक्का से आए पाँच पीरों को परचा देना (पंच पीर), लाखा बंजारा, बोयता सेठ, रत्ना राइका और हरजी भाटी के परचे। सभी कथाएँ: परचा संग्रह।

शिक्षाएँ

  • सब मनुष्य बराबर हैं — जाति के आधार पर भेदभाव न करें।
  • दीन-दुखियों, बीमारों और पशुओं की सेवा सबसे बड़ा धर्म है।
  • सच्चाई, गुरु-भक्ति और नाम-स्मरण।
  • हिंदू-मुस्लिम एकता — इसलिए वे “रामसा पीर” भी कहलाए।

समाधि

बाबा रामदेव जी ने भादवा सुदी एकादशी, वि.सं. 1442 को रुणिचा में जीवित समाधि ली, लगभग 33 वर्ष की आयु में। इसके एक दिन पहले डाली बाई ने समाधि ली थी। आज यही स्थान रामदेवरा का मुख्य मंदिर है। समाधि दिवस पर भादवा मेले का मुख्य दिन होता है। कुछ स्रोतों में ईसवी सन् में अलग वर्ष मिलता है; वि.सं. 1442 लगभग 1385 ईस्वी के बराबर है।

रामदेवरा मंदिर

समाधि स्थल पर बना वर्तमान मंदिर बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह जी द्वारा 1931 में बनवाया गया माना जाता है। मंदिर परिसर, दर्शन और आरती समय के लिए मंदिर परिचय और दर्शन समय देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बाबा रामदेव जी ने समाधि कब ली?

भादवा सुदी एकादशी, विक्रम संवत 1442 को, रुणिचा (रामदेवरा) में।

बाबा रामदेव जी का जन्म कब हुआ?

परंपरा के अनुसार वि.सं. 1409 में; जयंती भादवा सुदी बीज को मनाई जाती है।

बाबा रामदेव जी के माता-पिता कौन थे?

पिता राजा अजमल जी तंवर और माता रानी मैणादे।

बाबा रामदेव जी की पत्नी का नाम क्या था?

नेतलदे।

रुणिचा कहाँ है?

रुणिचा रामदेवरा का पुराना नाम है, जो जैसलमेर ज़िले में पोकरण के पास है — देखें रामदेवरा कहाँ है।

तिथियाँ और कथाएँ लोक-परंपरा व प्रचलित स्रोतों पर आधारित हैं; जहाँ मत अलग हैं, वहाँ दोनों बताए गए हैं। अंतिम अपडेट: 14 अक्टूबर 2026।

स्रोत: जन्म व समाधि की तिथियाँ प्रचलित लोक-परंपरा और संदर्भ ग्रंथों/लेखों (जैसे विकिपीडिया का “Ramdev Pir” लेख) पर आधारित हैं; वि.सं. 1442 की समाधि तिथि पर अधिकांश स्रोत सहमत हैं, जन्म तिथि व स्थान पर मत अलग हैं।

॥ जय बाबा रामदेव जी ॥