🛕 रुणिचा धाम — सम्पूर्ण मंदिर परिचय
पश्चिमी राजस्थान के रेतीले धोरों के बीच, जैसलमेर जिले के एक छोटे से गांव रामदेवरा में एक ऐसा मंदिर है जहाँ हिन्दू और मुस्लिम एक ही कतार में खड़े होकर एक ही संत को सिर झुकाते हैं। यह है बाबा रामदेव जी का समाधि मंदिर — रुणिचा धाम — जहाँ हर साल लाखों श्रद्धालु सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर पहुँचते हैं, हाथ में जलती हुई जोत लिए, बाबा का नाम गाते हुए। यह पेज आपको बाबा रामदेव जी के जीवन, मंदिर के इतिहास, दर्शन के समय, मेले की तारीखों और यात्रा की हर ज़रूरी जानकारी से परिचित कराएगा।
बाबा रामदेव जी का जन्म 14वीं सदी में पोकरण क्षेत्र के तंवर राजपूत राजा अजमल जी और रानी मीणलदे के घर हुआ था। कहा जाता है कि लंबे समय तक निःसंतान रहने के बाद राजा अजमल ने द्वारकाधीश की शरण ली, और उन्हीं के आशीर्वाद से रामदेव जी का जन्म हुआ — यही कारण है कि आज भी बड़ी संख्या में भक्त उन्हें साक्षात श्रीकृष्ण का अवतार मानते हैं।
बचपन से ही रामदेव जी में असाधारण शक्तियों के संकेत मिलने लगे थे। बड़े होकर उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों, वंचितों और ज़रूरतमंदों की सेवा में लगा दिया। उस दौर में जब जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव आम बात थी, रामदेव जी ने खुलकर समानता का संदेश दिया — मेघवाल समाज आज भी उन्हें अपना सबसे बड़ा रक्षक मानता है। उनकी सबसे प्रिय शिष्या डाली बाई, एक दलित परिवार की बेटी थीं, जिन्हें उन्होंने अपनी सगी बहन की तरह अपनाया और सम्मान दिया।
उनकी ख्याति इतनी दूर तक फैली कि मक्का से पाँच पीर उनकी परीक्षा लेने रुणिचा पहुँचे। कथा है कि जब पीरों ने कहा कि वे अपने ही कटोरों में भोजन करते हैं जो मक्का में छूट गए हैं, तो रामदेव जी ने अपनी दिव्य शक्ति से उन कटोरों को तुरंत वहीं प्रकट कर दिया। इस चमत्कार को देखकर पाँचों पीर आजीवन रुणिचा में ही बस गए, और आज भी उनकी समाधियाँ बाबा रामदेव जी की समाधि के निकट स्थित हैं — यही वजह है कि मुस्लिम समुदाय उन्हें रामशाह पीर कहकर उतनी ही श्रद्धा से पूजता है जितनी हिन्दू समाज।
भाद्रपद माह की शुक्ल एकादशी को, मात्र 33 वर्ष की आयु में, रामदेव जी ने रुणिचा में अपने भक्तों के सामने ही जीवित समाधि ले ली। समाधि लेने से पहले उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा था कि हर साल भाद्रपद में यहाँ एक मेला लगेगा, जहाँ वे अपने भक्तों को दर्शन देते रहेंगे — यही परंपरा आज सैकड़ों साल बाद भी उतनी ही जीवंत है।
जिस स्थान पर बाबा रामदेव जी ने समाधि ली, वहाँ सदियों तक एक साधारण समाधि स्थल ही रहा, जब तक कि 1931 में बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने वहाँ भव्य मंदिर का निर्माण नहीं करवाया। आज यही मंदिर रामदेवरा की पहचान है — इसका शिखर दूर से ही दिखाई देता है और रात में जगमगाती रोशनी में यह और भी मनमोहक लगता है।
मंदिर परिसर सिर्फ समाधि मंदिर तक सीमित नहीं है। यहाँ राम सरोवर नाम की एक झील है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसे स्वयं बाबा रामदेव जी ने बनवाया था — कई श्रद्धालु दर्शन से पहले यहाँ स्नान करना शुभ मानते हैं। इसके पास ही परचा बावड़ी नाम की एक प्राचीन बावड़ी है, और झूला-पालना नामक स्थान भी है, जहाँ संतान-प्राप्ति की कामना लेकर आए दंपत्ति एक छोटा पालना बांधते हैं।
मुख्य समाधि पर भक्त चादर, नारियल, चावल और चूरमा चढ़ाते हैं। एक विशेष परंपरा है कपड़े से ढके लकड़ी के छोटे घोड़े चढ़ाने की — यह उस बचपन की कथा से जुड़ी है जिसमें रामदेव जी का खिलौना घोड़ा उड़ गया था, और आज भक्त मन्नत पूरी होने पर ऐसा ही घोड़ा भेंट करते हैं। मंदिर परिसर में बाबा के पदचिन्ह — जिन्हें पगल्या कहा जाता है — भी स्थापित हैं, जिन्हें भक्त उतनी ही श्रद्धा से छूते और प्रणाम करते हैं जितना कि मूर्ति को। समाधि के पास ही पंच पीरों की दरगाह और डाली बाई की समाधि है, जहाँ अलग से दर्शन किए जाते हैं।
मंदिर आमतौर पर सुबह 4 बजे खुल जाता है और रात 9 बजे तक भक्तों के लिए खुला रहता है। दिन की शुरुआत मंगला आरती से होती है, जो सुबह साढ़े चार से पाँच बजे के बीच होती है। दोपहर में भोग आरती और फिर संध्या के समय सबसे भव्य आरती — संध्या आरती — होती है, जो शाम सात बजे के आसपास होती है और सैकड़ों घंटियों की एक साथ गूँज से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। भादवा मेले के दौरान मंदिर लगभग चौबीसों घंटे खुला रहता है, ताकि उमड़ने वाली भारी भीड़ को दर्शन में असुविधा न हो।
रामदेवरा का भादवा मेला राजस्थान के सबसे बड़े लोक-मेलों में गिना जाता है। यह हर साल भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक, यानी लगभग दस दिनों तक चलता है। 2026 में यह मेला 12 से 21 सितंबर तक आयोजित होगा, और सबसे ज़्यादा भीड़ समाधि-दिवस यानी 20 सितंबर के आसपास रहती है। मेले का पहला दिन बाबा रामदेव जी की जयंती के रूप में मनाया जाता है, जबकि दसवां दिन उनका समाधि-दिवस होता है — यही वह दिन है जब पूरा रामदेवरा भक्तों के सैलाब से भर जाता है।
मेले की सबसे खास बात है पैदल यात्रा (पदयात्रा) — हज़ारों श्रद्धालु हफ्तों पहले अपने गाँव-शहर से पैदल निकल पड़ते हैं, हाथ में जलती हुई जोत और रंग-बिरंगी निशान पताकाएं लिए, रास्ते भर बाबा के भजन गाते हुए। रास्ते में जगह-जगह स्वयंसेवक मुफ्त भोजन और विश्राम शिविर लगाते हैं। रुणिचा पहुँचकर यात्री मंदिर की परिक्रमा करते हैं, अपनी निशान पताका वहाँ स्थापित करते हैं और फिर दर्शन की कतार में लगते हैं।
मेले की रातें भजन-कीर्तन और तेरहताली नृत्य से जीवंत रहती हैं — यह कामड़ समुदाय की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला एक अनूठा बैठा हुआ नृत्य है, जिसमें शरीर से बंधी तेरह मंजीराओं की थाप पर नृत्य करते हुए कभी-कभी सिर पर घड़े या हाथ में तलवार भी संतुलित की जाती है। मेले में चूरमा और दाल-बाटी जैसे पारंपरिक राजस्थानी भोग का विशेष महत्व है, और जगह-जगह लगे भंडारों में आने वाले हर यात्री को निःशुल्क भोजन कराया जाता है।
मेले की तारीखें हिन्दू पंचांग पर आधारित होने के कारण हर साल थोड़ी बदलती हैं — 2027 में यह मेला 1 से 10 सितंबर और 2028 में 23 अगस्त से 2 सितंबर तक रहेगा।
सबसे सुविधाजनक तरीका है ट्रेन — रामदेवरा रेलवे स्टेशन मंदिर से मात्र एक-दो किलोमीटर दूर है और जोधपुर, जयपुर व बीकानेर से यहाँ के लिए सीधी ट्रेनें चलती हैं। सड़क मार्ग से आने पर जैसलमेर से यह दूरी लगभग 120 किमी (करीब 2 घंटे), जोधपुर से 190 किमी (साढ़े तीन घंटे), बीकानेर से 215 किमी (चार घंटे) और दिल्ली से लगभग 730 किमी है।
पूरी यात्रा गाइड देखें — ट्रेन शेड्यूल, बस व टैक्सी की जानकारी सहित →
रामदेवरा में धर्मशाला, होटल और शुद्ध शाकाहारी भोजनालयों की विस्तृत सूची अलग पेज पर तैयार की गई है:
रामदेवरा मंदिर कहाँ स्थित है?
रामदेवरा मंदिर राजस्थान के जैसलमेर जिले में, पोकरण से लगभग 12 किलोमीटर उत्तर की ओर स्थित है। इसी स्थान को रुणिचा धाम भी कहा जाता है।
भादवा मेला 2026 में कब है?
2026 में भादवा मेला 12 से 21 सितंबर तक रहेगा, जो भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक चलता है। सबसे ज़्यादा भीड़ समाधि-दिवस, यानी 20 सितंबर के आसपास होती है।
मंदिर के दर्शन का समय क्या है?
मंदिर आमतौर पर सुबह 4 बजे खुलता है और रात 9 बजे बंद होता है। संध्या आरती शाम करीब 7 बजे होती है। मेले के दौरान मंदिर लगभग पूरे दिन-रात खुला रहता है।
निकटतम रेलवे स्टेशन कौन सा है?
रामदेवरा रेलवे स्टेशन मंदिर से मात्र एक-दो किलोमीटर की दूरी पर है, और जोधपुर, जयपुर व बीकानेर से यहाँ सीधी ट्रेनें आती हैं।
बाबा रामदेव जी को मुस्लिम समुदाय क्यों पूजता है?
मान्यता है कि मक्का से पाँच पीर बाबा रामदेव जी की परीक्षा लेने आए थे और उनके चमत्कार से प्रभावित होकर आजीवन रुणिचा में ही बस गए। इसी कारण मुस्लिम समुदाय उन्हें रामशाह पीर कहकर पूजता है, और यह मंदिर सांप्रदायिक सद्भाव के सबसे बड़े उदाहरणों में गिना जाता है।
मंदिर में फोटोग्राफी की अनुमति है?
समाधि स्थल और गर्भगृह के भीतर फोटोग्राफी की अनुमति सामान्यतः नहीं दी जाती।
॥ जय बाबा रामदेव जी, जय रामशाह पीर ॥