✨ बाबा रामदेव जी का परचा
संक्षेप में: नेतलदे बाबा रामदेव जी की पत्नी थीं। लोक-परंपरा के अनुसार वे अमरकोट (आज का उमरकोट, सिंध) के सोढा राजपूत दलजी सोढा की पुत्री थीं। प्रचलित कथा में आता है कि नेतलदे शारीरिक रूप से असमर्थ थीं और चल नहीं सकती थीं, फिर भी बाबा ने अपने वचन के अनुसार उनसे विवाह किया — और विवाह के समय बाबा की कृपा से वे अपने पैरों पर खड़ी हो गईं। यही “नेतलदे को परचा” कहलाता है।
नेतलदे कौन थीं
लोक-कथाओं और बाबा से जुड़ी वंश-परंपरा के विवरणों में नेतलदे को अमरकोट के सोढा शासक दलजी सोढा की पुत्री बताया जाता है। अमरकोट थार रेगिस्तान के उस पार सिंध क्षेत्र में था, और उस समय पश्चिमी राजस्थान व सिंध के राजपूत घरानों में आपसी वैवाहिक संबंध आम थे। बाबा रामदेव जी के साथ नेतलदे का विवाह इसी परंपरा का हिस्सा माना जाता है।
बाबा रामदेव चालीसा की एक चौपाई में “दलजी को पुत्र देने” का उल्लेख आता है — यानी लोक-स्मृति में दलजी सोढा का परिवार भी बाबा की कृपा से जुड़ा हुआ है। इस प्रसंग की विस्तृत कथा अलग-अलग रूपों में मिलती है, इसलिए हम यहाँ केवल उसका उल्लेख कर रहे हैं।
नेतलदे को परचा — विवाह की कथा
लोक-परंपरा में सबसे अधिक सुनाई जाने वाली कथा यह है कि नेतलदे जन्म से या बचपन से चल-फिर नहीं सकती थीं। जब उनके विवाह की बात चली, तो परिवार चिंतित था कि ऐसी स्थिति में विवाह कैसे होगा। कथा के अनुसार बाबा रामदेव जी ने बचपन में ही नेतलदे से विवाह का वचन दिया था, और उन्होंने अपना वचन निभाया।
विवाह के फेरों के समय का प्रसंग इस कथा का केंद्र है। लोक-मान्यता है कि जब फेरे होने थे, तब बाबा ने नेतलदे का हाथ थामा और उनकी कृपा से नेतलदे अपने पैरों पर खड़ी होकर फेरे ले सकीं। उपस्थित लोगों ने इसे बाबा का परचा माना। अलग-अलग गायक-परंपराओं में इस प्रसंग के विवरण थोड़े अलग मिलते हैं, पर मूल भाव एक है — बाबा ने वचन निभाया और अपनी अर्धांगिनी को सम्मान दिया।
इस परचे का संदेश
नेतलदे की कथा बाबा रामदेव जी के उस संदेश को और गहरा करती है जो उनके पूरे जीवन में दिखता है — किसी भी व्यक्ति को उसकी शारीरिक स्थिति, जाति या जन्म के आधार पर कमतर नहीं आँकना। जिस समाज में विकलांगता को कलंक माना जाता था, वहाँ बाबा ने नेतलदे को सम्मान के साथ अपनाया। यह परचा वचन-पालन की सीख भी देता है: बाबा ने परिस्थिति बदलने पर भी अपना दिया हुआ वचन नहीं तोड़ा।
चालीसा में बाबा को “नयनहीन के रखवारे” और दुखियों का सहारा कहा गया है — नेतलदे की कथा इसी करुणा का पारिवारिक रूप है। आज भी बहुत से परिवार शारीरिक कष्ट से जूझ रहे परिजनों के लिए बाबा से प्रार्थना करते हैं और रामदेवरा में मन्नत माँगते हैं।
बाबा के परिवार में नेतलदे का स्थान
- पति: बाबा रामदेव जी (रुणिचा)।
- पिता: दलजी सोढा, अमरकोट (लोक-परंपरा के अनुसार)।
- ससुर-सास: अजमल जी तंवर और माता मैणादे — देखें अजमल जी को परचा और माता मैणादे को परचा।
- परिवार के अन्य सदस्य: जेठ वीरमदेव जी, ननद सुगना बाई — देखें सुगना बाई को परचा।
जम्मे और भजनों में नेतलदे
मारवाड़ के जम्मा-जागरण में बाबा के विवाह के प्रसंग “ब्यावलो” (विवाह-गीत) के रूप में भी गाए जाते हैं। इनमें बारात का रुणिचा से अमरकोट जाना, विवाह की रस्में और नेतलदे को परचा — सब भाव से गाया जाता है। गायक अक्सर इन गीतों को बाबा के वचन-पालन की महिमा के साथ जोड़ते हैं। भादवा मेले में रामदेवरा में लगने वाले जम्मों में ये प्रसंग प्रत्यक्ष सुने जा सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बाबा रामदेव जी की पत्नी का नाम क्या था?
नेतलदे। लोक-परंपरा के अनुसार वे अमरकोट के दलजी सोढा की पुत्री थीं।
नेतलदे को क्या परचा मिला?
प्रचलित कथा के अनुसार चल न पाने वाली नेतलदे विवाह के समय बाबा की कृपा से अपने पैरों पर खड़ी होकर फेरे ले सकीं।
अमरकोट कहाँ है?
अमरकोट (उमरकोट) आज के पाकिस्तान के सिंध प्रांत में, थार रेगिस्तान के पास है।
चालीसा में दलजी का उल्लेख क्यों है?
चालीसा की एक चौपाई में बाबा द्वारा दलजी को पुत्र देने का उल्लेख है; दलजी सोढा नेतलदे के पिता माने जाते हैं। इस प्रसंग की विस्तृत कथा के रूप अलग-अलग मिलते हैं।
इस परचे का मुख्य संदेश क्या है?
वचन-पालन, और किसी को उसकी शारीरिक स्थिति के आधार पर कमतर न आँकना।
यह कथा लोक-मान्यता, जम्मा-भजनों और परंपरागत कथाओं पर आधारित है। अलग-अलग क्षेत्रों और गायक-परंपराओं में कथा के विवरण भिन्न हो सकते हैं। संदर्भ: हिंदी विकिपीडिया — रामदेव पीर (नेतलदे व दलजी सोढा का उल्लेख), बाबा रामदेव चालीसा (रचना: नन्द)।
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॥ जय बाबा रामदेव जी ॥